नई दिल्ली: हमारे देश में क्रिकेट और हॉकी (Hockey) अंग्रेज लेकर आए थे. आगे चलकर हमने क्रिकेट में भी अंग्रेज़ों को हराया और हॉकी में भी. इस बार के Tokyo ओलम्पिक खेलों में भारत की पुरुष और महिला हॉकी टीम Semifinal में पहुंच चुकी हैं. इसके बाद से ही पूरे देश में माहौल हॉकीनुमा बना हुआ है. 

49 साल बाद सेमीफाइनल में पहुंचा भारत

वर्ष 1972 यानी 49 वर्षों के बाद पहला मौक़ा है, जब भारत ओलम्पिक खेलों (Tokyo Olympics 2021) के सेमीफाइनल में पहुंचा है. हम तो ये कहेंगे कि भारत अब गोल्ड मेडल के बेहद करीब है. आज़ादी से पहले गुलाम भारत ने हॉकी के ज़रिए अपने गौरव और ताक़त को पहचाना आगे चल कर हम हॉकी की महाशक्ति बने. इसके बाद धीरे धीरे भारत के मन में हॉकी की जगह क्रिकेट बस गया और हम हॉकी को भूलते चले गए. हॉकी में ना पैसा था और ना ग्लैमर. इसलिए आज बड़ा सवाल ये है कि हमारे देश में क्या हॉकी को फिर से खोया हुआ गौरव मिलेगा? आज हम आपको हॉकी की पूरी कहानी बताएंगे.

देखें वीडियो- 

पुरुष हॉकी (Hockey) टीम ने अपना आख़िरी मेडल 1980 के Moscow Olympics में जीता था. ये वही ओलम्पिक खेल थे, जिनमें पहली बार महिला हॉकी टीम ने भी भाग लिया था. लेकिन पिछले 41 वर्षों में ना तो महिला टीम मेडल जीत पाई और ना ही पुरुष टीम को कोई मेडल मिला. लेकिन इस बार दोनों टीमें सेमीफाइनल में पहुंच गई हैं और देश उनसे गोल्ड मेडल की उम्मीद कर रहा है.

वैसे तो भारत में क्रिकेट को धर्म की तरह माना जाता है और हमारे देश के लोग सरकार और नेताओं से ज़्यादा उम्मीदें क्रिकेटर्स से करते हैं. लेकिन पिछले कुछ घंटों में ये तस्वीर बदली है और अब पूरा देश हॉकी टीमों की बातें कर रहा है. ये एक बहुत बड़ा परिवर्तन है. सोमवार को जब महिला हॉकी टीम अपने Quarter Closing मुक़ाबले में तीन बार की गोल्ड Medalist ऑस्ट्रेलिया की टीम के ख़िलाफ़ मैदान पर उतरी तो किसी को उम्मीद नहीं थी कि ये टीम जीत जाएगी.

लेकिन इस टीम ने ना सिर्फ़ जीत हासिल की बल्कि हॉकी का Reel Life वाला Chak De India Second भी सबको याद दिला दिया . भारतीय महिला हॉकी टीम ने Gold Medal की दावेदार मानी जा रही ऑस्ट्रेलिया को 1-Zero से हरा दिया. इस जीत ने देश को नए जोश से भर दिया. 60 मिनट के इस खेल में कई ऐसे मौक़े आए, जब लगा कि ऑस्ट्रेलिया की टीम भारत की इस टीम को भेद कर बॉल को Aim Publish में डाल देगी . लेकिन भारत की टीम ने ऐसा नहीं होने दिया. अब ये 60 मिनट इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गए है. इन 60 मिनटों को इस टीम के खिलाड़ियों से कोई नहीं छीन सकता.

ऑस्ट्रेलिया के सामने दीवार बन गई सविता पुनिया  

इस मैच में ऑस्ट्रेलिया की टीम को 7 Penalty Corners मिले लेकिन इस दौरान गोलकीपर सविता पुनिया दीवार की तरह Aim Publish के सामने खड़ी रही और एक भी Penalty Nook को गोल में तब्दील नहीं होने दिया. हमारे देश में पूर्व क्रिकेट राहुल द्रविड को.. The Nice Wall of Group India कहा जाता था. लेकिन सविता पुनिया ने साबित कर दिया कि वो भी हॉकी टीम की एक मजबूत दीवार हैं, जो उनके इरादों के सीमेंट से तैयार हुई है.

हॉकी के खेल में ऑस्ट्रेलिया जैसी टीम को Aim Publish से दूर रखना बहुत मुश्किल माना जाता है. लेकिन भारतीय टीम ने ना सिर्फ़ अपना गोल होने से रोका बल्कि ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ एक गोल दाग कर मैच को भी अपनी तरफ़ कर लिया . ये गोल गुरजीत कौर ने खेल के 22वें मिनट में पेनल्टी कॉर्नर के दौरान किया. इसके बाद पूरी टीम ने अपनी ताकत गोल बचाने में लगा दी, जिसमें वो कामयाब भी रही.

इस हार से आज ऑस्ट्रेलिया की टीम सदमे में थी. मैच के बाद फील्ड पर इन खिलाड़ियों की आंखों में आंसू थे. इन तस्वीरों से ही आप समझ सकते हैं कि भारतीय महिला हॉकी टीम के लिए ये जीत कितनी बड़ी और यादगार है. समझने वाली एक बात ये भी है कि ऑस्ट्रेलिया की टीम इस मैच में तभी हार गई थी जब उसे ये लगा कि वो भारतीय टीम के ख़िलाफ़ आसानी से जीत जाएगी. कहते हैं कि हॉकी जैसे खेलो में वार सामने वाले खिलाड़ी पर नहीं बल्कि उसके दिमाग पर किया जाता है और गोल खुद ब खुद हो जाता है. भारतीय टीम ने बिल्कुल ऐसा ही किया.

इस जीत के बाद पूरी टीम और कोच शोर्ड मारिन (Sjoerd Marijne) भी काफी भावुक हो गए और उनकी आंखों से भी आंसू आ गए. उन्होंने मैदान से ही अपने परिवार से फोन पर बात की और अपने परिवार से कहा कि मुझे माफ कर दीजिए क्योंकि मैं अब देर से घर आऊंगा.

रियल लाइफ रीटेक का मौका नहीं देती

इस जीत ने लोगों को 2007 में आई एक फिल्म की याद भी दिला दी, जिसका नाम था चक दे इंडिया. कुछ लोग ये भी कहने लगे कि ये जीत इसी फिल्म से प्रेरित होकर मिली है. लेकिन ऐसा कहने वाले लोगों को समझना चाहिए कि ये जीत Actual Life वाली है ना कि Reel Life वाली. फिल्मों में Retake के बहुत सारे मौके होते हैं लेकिन असल जिंदगी के मुकाबले किसी को Retake का मौका नहीं देते. Actual Life में खेला गया हर Shot Closing Shot होता है.

खिलाड़ी फिल्में देख कर चैंपियन नहीं बनते क्योंकि फिल्मों में जो कलाकार खिलाड़ियों का किरदार निभाते हैं. वो ऐसा सिर्फ़ मनोरंजन के लिए करते हैं . जबकि मैदान पर उतरने वाले खिलाड़ी अपने देश के लिए मेडल जीतने के लिए उतरते हैं. लेकिन फिर भी हमारे देश में कई लोगों को ये गलतफहमी हो जाती है कि खिलाड़ी फिल्मों से प्रेरित होते हैं. जबकि सच ये है कि खिलाड़ी Gentle Digital camera और Motion के दम पर नहीं बल्कि Struggle, Focus और Dedication के दम पर चैंपियन बनते हैं. 

फिर भी कुछ लोग फिल्मी खिलाड़ियों को ही असली खिलाड़ी समझ लेते हैं और देश की जीत पर उनका Interview तक करने लगते हैं. लेकिन Zee Information ऐसा नहीं करेगा. महिला हॉकी टीम के अलावा पुरुष हॉकी टीम भी ओलम्पिक खेलों के सेमीफाइनल में पहुंच गई है. 1 अगस्त को पुरुष हॉकी टीम ने ग्रेट ब्रिटेन को 3-1 से हराया और ये जीत बहुत बड़ी थी. इस जीत के बाद Commentator भी भावुक हो गए. 

अब सेमीफाइनल में पुरुष हॉकी (Hockey) टीम का मुक़ाबला Belgium से होगा. ये मैच Three अगस्त यानी कल सुबह 7 बजे से शुरू होगा. जबकि महिला हॉकी टीम का सेमीफाइनल मुक़ाबला Four अगस्त को है. इसमें अर्जेंटीना की टीम उसके सामने होगी.

क्रिकेट के दबदबे में दब गई हॉकी

हमारे देश में छपने वाले लगभग सभी बड़े अख़बारों में खेल से जुड़ी ख़बरों के लिए एक या दो पेज होते हैं. लेकिन इन पन्नों पर क्रिकेट और क्रिकेटर्स से जुड़ी ख़बरें ज़्यादा होती हैं. न्यूज चैनलों पर भी अक्सर क्रिकेट की ख़बरें दिखाई जाती हैं. लेकिन कई दशकों के बाद ऐसा हुआ है, जब हॉकी ने भारत में अपनी खोई हुई पहचान को वापस पाया है. इसलिए आप इस जीत को भारत में हॉकी की जीत भी कह सकते हैं.

वैसे तो 41 वर्षों से भारत ने हॉकी में कोई मेडल नहीं जीता. लेकिन इसके बावजूद इस खेल में भारत के पास सबसे ज़्यादा मेडल हैं. ओलम्पिक खेलों में भारत के पास हॉकी में Eight गोल्ड, एक सिल्वर और दो Bronze Medals मिला कर कुल 11 पदक हैं. सबसे ज़्यादा Gold Medals जीतने वाले देशों में भी भारत सबसे ऊपर है. भारत के पास Eight Gold Medals हैं. जबकि Four Gold के साथ जर्मनी दूसरे और तीन गोल्ड के साथ ग्रेट ब्रिटेन तीसरे स्थान पर है.

हालांकि ये मेडल टैली आज किसी पुरानी तस्वीर की तरह एक स्टोर रूम में धूल खा रही है. हॉकी (Hockey) की स्टिक को लोगों ने अपनी गाड़ियों में रखना शुरू कर दिया है. हमारे देश के बहुत से लोग सड़कों पर लड़ने के लिए अपनी गाड़ियों में हॉकी की स्टिक रखते हैं और ये स्टिक अक्सर मारपीट के काम में आती है. इसी से आप समझ सकते हैं कि हमारे देश में आज हॉकी का स्थान कहां है.

हालांकि हॉकी के प्रति ये भावना हमेशा से ऐसी नहीं थी. कहा जाता है कि भारत में हॉकी का खेल तब आया, जब देश अंग्रेज़ों का गुलाम था. उस समय ब्रिटेन ने भारत में हॉकी को लोकप्रिय बनाने के लिए सेना में इस खेल की शुरुआत की. ये वही दौर था, जब भारत में क्रिकेट और हॉकी दोनों को महत्व मिल रहा था और अंग्रेज़ी सरकार इन खेलों को भारत में बढ़ावा दे रही थी.

देश का स्वाभिमान रही है हॉकी

वर्ष 1908 के London Olympics में पहली बार हॉकी का Debut हुआ. फिर पहले विश्व युद्ध के बाद वर्ष 1920 के ओलम्पिक खेलों में भी हॉकी को जगह मिली. हालांकि तब तक भारत इन खेलों में हिस्सा नहीं लेता था. जो खिलाड़ी भारत की तरफ़ से इन खेलों में जाते भी थे, उनमें कई ब्रिटिश मूल के होते थे.

ऐसा भी कहा जाता है कि जब भारतीय खिलाड़ी हॉकी की फील्ड में उतरे तो ब्रिटिश अधिकारियों ने उनका मज़ाक़ बनाया. क्योंकि अंग्रेज भारत को संपेरों का देश कहते थे. उन्हें हमारे हाथ में सांप की बीन ही नज़र आती थी. ये अंग्रेज़ों की सबसे बड़ी भूल थी. 1920 का दशक, वो दशक था जब भारत में अनेको स्वतंत्रता आन्दोलन शुरू हुए. इसी दौरान भारतीय हॉकी टीम भी बनी. इस टीम में जो खिलाड़ी थे, वो अपनी हॉकी स्टिक से ब्रिटिश सरकार को जवाब देना चाहते थे. इनमें हॉकी के महान खिलाड़ी मेजर ध्यान चंद भी थे.

Worldwide Hockey Federation की स्थापना के ठीक एक साल बाद वर्ष 1925 में Indian Hockey Federation का गठन हुआ. फिर वर्ष 1926 में पहली बार भारतीय हॉकी टीम अपने पहले विदेशी दौरे पर न्यूज़ीलैंड गई, जहां उसने 21 मैचों में से 18 मैच जीत कर सबको हैरान कर दिया था. तब इस Match में युवा मेजर ध्यान चंद की हॉकी स्टिक का जादू दुनिया ने देखा.

हार के डर से ब्रिटेन ने ओलंपिक में नहीं भेजी थी टीम

वर्ष 1928 के ओलम्पिक खेलों से पहले भारतीय टीम ब्रिटेन के दौरे पर भी गई थी, जहां उसने उसकी हॉकी टीम को बुरी तरह हराया. इस हार के बाद ब्रिटेन समझ गया था कि अगर उसने ओलम्पिक खेलों में अपनी टीम भेजी तो वहां भी ये टीम भारत की हॉकी टीम से हार जाएगी और ये उसके लिए शर्मनाक होगा. इसी डर की वजह से ही ग्रेट ब्रिटेन की हॉकी टीम वर्ष 1928 के ओलम्पिक खेलों में नहीं गई.

भारत के स्वतंत्रता सेनानियों के बाद अंग्रेज़ पहली बार किसी भारतीय से इस तरह डरे थे. उनका ये डर सही भी था. वर्ष 1928 के ओलम्पिक खेलों में भारतीय टीम ने ना सिर्फ़ भाग लिया बल्कि इन खेलों में हमने गोल्ड मेडल भी जीता. दिलचस्प बात ये है कि तब भारत की हॉकी टीम ने कुल पांच मुक़ाबलों में 29 गोल दाग़े. जबकि किसी भी देश की प्रतिद्वंदी टीम बॉल को भारत के गोल पोस्ट में नहीं डाल सकी. यानी 1928 का ओलम्पिक्स भारत ने 29-Zero से जीता. तब इन 28 Objectives में से 14 Objectives अकेले मेजर ध्यान चंद ने किए थे.

1928 के बाद 1932 और फिर 1936 के Berlin Olympics में भी भारत ने गोल्ड मेडल जीत कर पहली हैट्रिक लगाई. Berlin Olympics का फाइनल मैच देखने के लिए Germany के तानाशाह Adolf Hitler खुद मैदान पर मौजूद थे. बड़ी बात ये है कि इस ओलम्पिक खेल में मेजर ध्यान चंद भारतीय टीम के कैप्टन भी थे.

फाइनल मैच के दौरान खेल में उनका एक दांत भी टूट गया था, जिसके बाद उन्हें फील्ड से बाहर जाना पड़ा था. कुछ ही देर बाद वो वापस आए और उन्होंने तय किया कि वो तेज़ भागने के लिए बिना जूतों के खेलेंगे और ऐसा करते हुए उन्होंने अकेले फाइनल मैच में 6 गोल दाग़े. हालांकि मेज़र ध्यान चंद का ये आख़िरी ओलम्पिक खेल भी साबित हुआ. इसके बाद दूसरे विश्व युद्ध की वजह से वर्ष 1948 तक Olympics का आयोजन नहीं हुआ.

ध्यानचंद का सपना रह गया अधूरा

ध्यान चंद ने अपने जीवन में सबकुछ हासिल किया लेकिन वो अपने एक सपने को कभी पूरा नहीं कर पाए. उनका सपना ओलम्पिक्स में भारत पर शासन करने वाले अंग्रेज़ों की टीम को हराना था. लेकिन हार के डर से ब्रिटेन की हॉकी टीम ओलम्पिक्स में नहीं खेल रही थी, इसलिए उनका ये सपना अधूरा रह गया.

हालांकि वर्ष 1947 में जब भारत को ब्रिटिश शासन से आज़ादी मिली तो उसके एक साल बाद 1948 में London Olympics हुए. इन खेलों में ग्रेट ब्रिटेन की हॉकी टीम ने हिस्सा लिया. ये संयोग ही था कि फाइनल में भारत का मुक़ाबला ग्रेट ब्रिटेन की टीम से हुआ. और भारतीय हॉकी (Hockey) टीम ने अंग्रेज़ी टीम को उन्हीं के घर में 4-Zero से हरा कर गोल्ड मेडल जीत लिया. इस जीत ने पूरे देश को गौरवान्वित किया और ये पहला मौक़ा था, जब भारतीय टीम पोडियम पर थी और Medal Ceremony के दौरान ग्रेट ब्रिटेन के सामने भारत का राष्ट्रगान बजा और तिरंगा भी अंग्रेज़ों के सामने लहराया.

ये लम्हा भारतीय हॉकी टीम की वजह से ही देश को नसीब हुआ था. उस समय इस टीम के कैप्टन Kishan Lal थे और Balbir Singh Senior ग्रेट ब्रिटेन के अटैक को ध्वस्त कर रहे थे.

वर्ष 1948 के बाद हॉकी में भारत ने 1952 और फिर 1956 के ओलम्पिक खेलों का भी गोल्ड मेडल जीता. यानी ओलम्पिक्स में ये भारत की दूसरी गोल्ड हैट्रिक थी. ये वो दौर था, जब हमारे देश के लोगों को क्रिकेट के नहीं बल्कि हॉकी के खिलाड़ियों के नाम याद होते थे. भारत में हॉकी को लोग धर्म की तरह पूजते थे. आप सबको 1990 और 2000 का दशक याद होगा, जब क्रिकेट में भारत की टीम पाकिस्तान से हार जाती थी तो बड़े पैमाने पर खिलाड़ियों का विरोध होता था और मैच के दौरान Tv सेट भी तोड़े जाते थे.

आपको ये नहीं पता होगा कि.. इस परम्परा की शुरुआत वर्ष 1960 में हुई थी. आज़ादी से पहले भारत और पाकिस्तान के खिलाड़ी एक ही टीम से खेलते थे लेकिन आज़ादी के बाद जब विभाजन हुआ तो पाकिस्तान ने भी हॉकी की टीम बनाई और वर्ष 1960 के ओलम्पिक्स में यही टीम फाइनल में भारत की टीम के साथ सामने थी. हमारी टीम ये मुक़ाबला हार गई थी. वर्ष 1928 के बाद पहली बार ऐसा हुआ था, जब हमें हॉकी में सिल्वर मेडल से ही संतोष करना पड़ा और देश में हॉकी खिलाड़ियों का विरोध हुआ. भारत ने 1964 के Tokyo Olympics में फिर से हॉकी में गोल्ड मेडल जीता लेकिन हमारे देश के लोग पाकिस्तान से मिली हार को काफ़ी समय तक नहीं भूले.

1975 में भारत ने पाकिस्तान को हराया

हालांकि इसमें 1975 के Hockey World Cup ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इस World Cup के फाइनल में भारत और पाकिस्तान की टीम आमने सामने थी और भारत ने पाकिस्तान को हरा कर ये खिताब जीत लिया था. इस जीत के बाद भारतीय हॉकी टीम का देश ने ज़ोरदार स्वागत किया और ये स्वागत वर्ष 1983 के Cricket World Cup के सेलिब्रेशन से भी बड़ा और भव्य था.

हॉकी में भारत को आख़िरी गोल्ड वर्ष 1980 के Moscow Olympics में मिला था और उसके बाद फिर कभी हमारी टीम पोडियम तक नहीं पहुंची. इस फेलियर की एक वजह हॉकी के खेल में हुआ बदलाव भी था. क्योंकि तब तक हॉकी का खेल घास के मैदान से Astroturf यानी Synthetic Grass Area पर शिफ्ट हो गया था. वर्ष 1976 में जब पहली बार ऐसे मैदानों पर खेल हुए तो भारत सातवें स्थान पर रहा था. वर्ष 2008 के बीजिंग ओलम्पिक्स में तो ऐसा हुआ, जब हॉकी में हमारा देश Qualify ही नहीं कर पाया. महिला हॉकी टीम भी अब तक ओलम्पिक खेलों में कोई मेडल नहीं जीती है. यानी दोनों टीमों के पास इस समय मेडल का सूखा ख़त्म करने का मौक़ा है.

भारत ने हॉकी की दुनिया पर 54 वर्षों तक एक छत्र राज किया. हॉकी (Hockey) का खेल भारत के स्वाभिमान का प्रतीक था. जबकि कई देशों की नज़र उस समय गुलाम भारत के खिलाड़ियों पर थी. ये देश चाहते थे कि भारत के खिलाड़ी उनके देश की तरफ से खेलना शुरू कर दे. इनमें हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद भी थे, जिन्हें एडॉल्फ हिटलर ने अपने देश की सेना में फील्ड मार्शल बनने की पेशकश की थी. लेकिन ध्यानचंद ने हिटलर को बहुत विनम्रता से कहा कि भारत उनका देश है और वो भारत में ही ठीक हैं. ये भारतीय हॉकी का वो स्वर्णिम इतिहास है. जिसके बारे में देश के हर नागरिक को पता होना चाहिए. 

1857 की क्रांति खत्म होते होते 19वीं सदी आधी बीत चुकी थी. भारत अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ा तो खूब लेकिन भारतीयों का स्वाभिमान छलनी था क्रिकेट को अंग्रेज़ों ने भारत के लोगों का ध्यान बंटाने के लिए शुरू किया लेकिन अंग्रेज़ों के खिलाफ जो हूक सीने में पल रही थी उसे हॉकी ने सहारा दिया.

अंग्रेज़ों को इल्म भी नहीं था कि हॉकी के सहारे भारत के खिलाड़ी उसके साम्राज्य को चुनौती देने वाले हैं. बिना खड़ग बिना ढाल भारत हॉकी में कमाल करने वाला है. 1928 और 1932 में हॉकी का गोल्ड अपने नाम करने वाली भारतीय टीम जब 1936 में बर्लिन ओलंपिक्स पहुंची तो उस समय का दुनिया का सबसे बड़ा और खतरनाक तानाशाह एडॉल्फ हिटलर भी भारतीय हॉकी के इस जादू का गवाह बना. 

ध्यानचंद को रोक पाना बेहद मुश्किल होता था

इस बार कमान मेजर ध्यानचंद के हाथों में थी. हॉकी (Hockey) के मैदान में तूफानी रफ़्तार से गोल की तरफ बढ़ते ध्यानचंद को रोक पाना दुनिया के किसी भी खिलाड़ी के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी. ध्यानचंद का असली हुनर उनके दिमाग में था वो हॉकी के मैदान को उस अंदाज़ से देखते थे, जैसे शतरंज का कोई तेज ख़िलाड़ी चेस बोर्ड को देखता है. कब कैसे और किसको मात देकर बॉल को गोल तक पहुंचाना है ध्यानचंद को बखूबी आता था.

1936 के बर्लिन ओलंपिक में ही ध्यानचंद का सामना तानाशाह हिटलर से हुआ. बर्लिन के हॉकी स्टेडियम में उस दिन करीब 40 हज़ार लोग फ़ाइनल देखने के लिए मौजूद थे. टीम जर्मनी का हौसला बढ़ाने के लिए ख़ुद हिटलर स्टेडियम में मौजूद था.

first half तक भारत सिर्फ़ 1 गोल से आगे चल रहा था लेकिन second Half में ध्यानचंद ने खेल का पासा बदल गया. भारत ने 8-1 से जर्मनी को उसी के मैदान में हराकर फाइनल जीत लिया.

जब हिटलर ने दिया ध्यानचंद को ऑफर

जर्मनी को हारता देख हिटलर पहले ही मैदान छोड़ जा चुका था क्योंकि इस तानाशाह को हार बर्दाश्त नहीं थी. हिटलर जर्मनी को हराने वाले हीरो से मिलना चाहता था. इसलिए ध्यानचंद को मिलने का न्यौता भेजा. परेशान मन से ध्यानचंद हिटलर से मिलने पहुंचे. हिटलर ने हॉकी के जादूगर को ऊपर से नीचे तक ध्यान से देखा और पूछा
हिटलर- क्या करते हो
ध्यानचंद- जी सेना में हूं
हिटलर- तुम्हारी रैंक क्या है
ध्यानचंद- मैं लैंस नायक हूं
हिटलर- जर्मनी रुक जाओ मैं तुम्हें फील्ड मार्शल बना दूंगा

ये सुनकर ध्यानचंद चौंक गये लेकिन अपनी भावनाओं को अपने चेहरे पर नहीं आने दिया. बड़ी विनम्रता के साथ ध्यानचंद ने हिटलर के प्रस्ताव को ठुकरा दिया और कहा कि भारत मेरा वतन है और मैं वहां ठीक हूं.

पहली बार हिटलर के सामने किसी के ना झुकने की खबर दुनियाभर के अखबारों में छपी. अपने देश के लिए ध्यानचंद का सम्मान पूरी दुनिया ने देखा. इसके बाद ध्यानचंद की इस परंपरा को भारत के खिलाड़ियों ने आगे बढ़ाया. हालांकि वर्ष 1980 का दशक खत्म होते होते हॉकी के मैदान पर भारत की ये धार कमज़ोर होने लगी.

1976 के मोंट्रियल ओलंपिक्स में पहली बार फील्ड हॉकी के लिए एस्ट्रो टर्फ का इस्तेमाल हुआ. जबकि भारत के खिलाड़ियों को घास पर खेलने की आदत थी. नतीजा ये हुआ कि भारत इस ओलंपिक में ब्रॉन्ज़ तक नहीं जीत पाया .

एस्ट्रोटर्फ के आने से बदल गए हालात

उस समय तक भारत हॉकी (Hockey) की दुनिया की बड़ी ताकत था. लेकिन भारतीय हॉकी संघ की तरफ से ऐसी कोई कोशिश नहीं की गई. जिससे एस्ट्रो टर्फ की जगह घास के इस्तेमाल पर सहमति बन पाती.

घास के मैदान पर गेंद को कब्ज़े में रखने में भारत के खिलाड़ी माहिर थे. वहीं एस्ट्रो टर्फ पर शारीरिक दम खम की ज़रूरत पड़ती थी. यूरोप और ऑस्ट्रेलिया के खिलाड़ियों की ताकत के आगे भारत के खिलाड़ी कमज़ोर पड़ने लगे.

आज भी बहुत कम उम्र में हॉकी खेलने की शुरुआत करने वाले खिलाड़ियों को एस्ट्रो टर्फ नसीब नहीं होता क्योंकि इसका निर्माण बहुत महंगा है. नतीजा ये होता है कि एस्ट्रो टर्फ पर खेलने की आदत पड़ते पड़ते,खिलाड़ी के जीवन का एक बड़ा हिस्सा निकल जाता है.

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हालांकि पिछले कुछ वर्षों में भारत के हॉकी खिलाड़ी इस सिंथेटिक टर्फ को भी साधना सीख गए हैं. टोक्यो में पारा इन दिनों 40 डिग्री है. ज्यादातर देशों के खिलाड़ियों को इतनी गर्मी की आदत नहीं है. जबकि भारत के खिलाड़ी इस गर्मी के आदि हैं. इसलिए पुरुष और महिला टीमों के मैच में भारत के खिलाड़ी ना थके और ना रुके. दोनों टीमें ने एक बाद एक इतिहास रच दिया. अब उम्मीद यही है कि ये तपन भारत के प्रयासों को जल्द सोने के मेडल में बदल देगी.

हॉकी और क्रिकेट, ये दोनों खेल अंग्रेज़ी सरकार अपने समय में भारत लाई थी. क्रिकेट ज़्यादातर उन्हीं देशों में खेला जाता है, जहां अंग्रेज़ों ने शासन किया था. जबकि हॉकी खेलने वाले देशों की सूची बहुत लम्बी है.

क्रिकेट की तुलना में हॉकी ज्यादा चुनौतीपूर्ण

इस समय Worldwide Cricket Council में केवल 12 देश ही स्थाई सदस्य हैं, जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेलते हैं. भारतीय टीम का मुक़ाबला इन्हीं देशों की टीम से होता है. जबकि हॉकी 117 देशों में खेला जाता है. यानी हॉकी में अपनी जगह बनाना किसी भी देश के लिए बहुत बड़ी चुनौती है. इसके बावजूद हमारे देश में क्रिकेट का पलड़ा हॉकी से भारी है.

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function kalturaplayerSetup(kalturaPlayer, playbackType)
kalturaPlayer.setMedia(
plugins: ,
sources: playbackType
);

function doRegisterEvents(kalturaPlayer)
/* player event*/
kalturaPlayer.addEventListener(kalturaPlayer.Event.Core.PLAY, playEvent);
kalturaPlayer.addEventListener(kalturaPlayer.Event.Core.PAUSE, pauseEvent);
kalturaPlayer.addEventListener(kalturaPlayer.Event.Core.PLAYBACK_ENDED, playbackEndedEvent);

/* ad event */
kalturaPlayer.addEventListener(kalturaPlayer.Event.AD_STARTED, adStartedEvent);
kalturaPlayer.addEventListener(kalturaPlayer.Event.AD_COMPLETED, adCompletedEvent);
kalturaPlayer.addEventListener(kalturaPlayer.Event.AD_SKIPPED, adSkippedEvent);
kalturaPlayer.addEventListener(kalturaPlayer.Event.AD_CLICKED,adClicked);

var isVideoPlayed = false;
var isAdSkippedCompleted = false;
var videotype = rtitle;
function adStartedEvent(event)
gtag(‘event’, ‘Adstarted’, ‘event_category’: videotype, ‘event_label’: vlabel);
gtag(‘event’, ‘Play’, ‘event_category’: videotype, ‘event_label’: vlabel);
isVideoPlayed = true;
isAdSkippedCompleted = true;

function adCompletedEvent(event)
gtag(‘event’, ‘Adcompleted’, ‘event_category’: videotype, ‘event_label’: vlabel);
isAdSkippedCompleted = true;

function adSkippedEvent(event)
gtag(‘event’, ‘Adskipped’, ‘event_category’: videotype, ‘event_label’: vlabel);
isAdSkippedCompleted = true;

function adClicked(event)
gtag(‘event’, ‘Adclicked’, ‘event_category’: videotype, ‘event_label’: vlabel);

function playbackEndedEvent(event)
gtag(‘event’, ‘Complete’, ‘event_category’: videotype, ‘event_label’: vlabel);

function playEvent(event)
if((isVideoPlayed) && (isAdSkippedCompleted))
isAdSkippedCompleted = false;
else if((isVideoPlayed))
gtag(‘event’, ‘resume’, ‘event_category’: videotype, ‘event_label’: vlabel);
else
gtag(‘event’, ‘Play’, ‘event_category’: videotype, ‘event_label’: vlabel);
isVideoPlayed = true;

function pauseEvent(event)
gtag(‘event’, ‘Pause’, ‘event_category’: videotype, ‘event_label’: vlabel);

function AdloadEvent(event)
gtag(“event”, “kaltura_adloaded”, “event_category”: videotype, “event_label”: vlabel);

function AdProgressEvent(event)
gtag(“event”, “kaltura_adprogress”, “event_category”: videotype, “event_label”: vlabel);

function adPausedEvent(event)
gtag(“event”, “kaltura_adpaused”, “event_category”: videotype, “event_label”: vlabel);

/* End of Kaltura player function code */

$(document).delegate(“div[id^=’play’]”, “click”, function()
//console.log($(this).attr(“id”));
//console.log($(this).attr(“video-source”));
//console.log($(this).attr(“video-code”));
var isyoutube = $(this).attr(“video-source”);
var vurl = $(this).attr(“video-path”);
var vid = $(this).attr(“id”);
$(this).hide();
var pvid = $(this).attr(“newsid”);
var vx = $(this).attr(“id”).replace(‘play-‘,”);
var vC = $(this).attr(“video-code”);
var playDiv = “video-” + vid + “-” + pvid;
if(isyoutube ==’No’)
videoPlayerAPIReady(vid, vC, playDiv,vx, pvid, vurl);
else
onYouTubePlay(vid, vC, playDiv,vx, pvid);

);
$(document).delegate(“div[id^=’ptop’]”, “click”, function()
var vid = $(this).attr(“id”).replace(‘ptop’,”);
$(this).hide();
var pvid = $(this).attr(“newsid”);
//console.log($(this).attr(“id”) + “–” + vid);
//console.log($(this).parent().children().find(‘#play-‘+vid).attr(“video-source”));
//console.log($(this).parent().children().find(‘#play-‘+vid).attr(“video-code”));
var isyoutube = $(this).parent().children().find(‘#play-‘+vid).attr(“video-source”);
var vC = $(this).parent().children().find(‘#play-‘+vid).attr(“video-code”);
var vurl = $(this).parent().children().find(‘#play-‘+vid).attr(“video-path”);
var playDiv = “mvideo-play-” + vid + “-” + pvid;
if(isyoutube ==’No’)
//console.log(jwplayer($(this).attr(“id”)).getState());
videoPlayerAPIReady($(this).attr(“id”), vC, playDiv, vid, pvid,vurl);

else
onYouTubePlay($(this).attr(“id”), vC, playDiv, vid, pvid);

);

if($.autopager==false){
var use_ajax = false;

function loadshare(curl){
history.replaceState(” ,”, curl);
if(window.OBR)
window.OBR.extern.researchWidget();

//console.log(“loadshare Call->” + curl);
//$(‘html head’).find(‘title’).text(“main” + nxtTitle);
if(_up == false)
var cu_url = curl;
gtag(‘config’, ‘UA-2069755-1’, ‘page_path’: cu_url );

if(window.COMSCORE)
window.COMSCORE.beacon(c1: “2”, c2: “9254297”);
var e = Date.now();
$.ajax(
url: “/marathi/news/zscorecard.json?” + e,
success: function(e)
)

}
if(use_ajax==false) {
//console.log(‘getting’);
var view_selector=”div.center-section”; // + settings.view_name; + ‘.view-display-id-‘ + settings.display;
var content_selector = view_selector; // + settings.content_selector;
var items_selector = content_selector + ‘ > div.rep-block’; // + settings.items_selector;
var pager_selector=”div.next-story-block > div.view-zhi-article-mc-all > div.view-content > div.clearfix”; // + settings.pager_selector;
var next_selector=”div.next-story-block > div.view-zhi-article-mc-all > div.view-content > div.clearfix > a:last”; // + settings.next_selector;
var auto_selector=”div.tag-block”;
var img_location = view_selector + ‘ > div.rep-block:last’;
var img_path=”

लोडिंग

“; //settings.img_path;
//var img = ‘

‘ + img_path + ‘

‘;
var img = img_path;
//$(pager_selector).hide();
//alert($(next_selector).attr(‘href’));
var x = 0;
var url=””;
var prevLoc = window.location.pathname;
var circle = “”;
var myTimer = “”;
var interval = 30;
var angle = 0;
var Inverval = “”;
var angle_increment = 6;
var handle = $.autopager({
appendTo: content_selector,
content: items_selector,
runscroll: maindiv,
link: next_selector,
autoLoad: false,
page: 0,
start: function()
$(img_location).after(img);
circle = $(‘.center-section’).find(‘#green-halo’);
myTimer = $(‘.center-section’).find(‘#myTimer’);
angle = 0;
Inverval = setInterval(function ()
$(circle).attr(“stroke-dasharray”, angle + “, 20000”);
//myTimer.innerHTML = parseInt(angle/360*100) + ‘%’;
if (angle >= 360)
angle = 1;

angle += angle_increment;
.bind(this),interval);
,
load: function()
$(‘div.loading-block’).remove();
clearInterval(Inverval);
//$(‘.repeat-block > .row > div.main-rhs394331’).find(‘div.rhs394331:first’).clone().appendTo(‘.repeat-block >.row > div.main-rhs’ + x);
$(‘div.rep-block > div.main-rhs394331 > div:first’).clone().appendTo(‘div.rep-block > div.main-rhs’ + x);
$(‘.center-section >.row:last’).before(‘

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‘);
$(“.main-rhs” + x).theiaStickySidebar();
var fb_script=document.createElement(‘script’);
fb_script.text= “(function(d, s, id) var js, fjs = d.getElementsByTagName(s)[0];if (d.getElementById(id)) return;js = d.createElement(s); js.id = id;js.src=”https://connect.facebook.net/en_GB/sdk.js#xfbml=1&version=v2.9″;fjs.parentNode.insertBefore(js, fjs);(document, ‘script’, ‘facebook-jssdk’));”;
var fmain = $(“.sr”+ x);
//alert(x+ “-” + url);
var fdiv = ‘

‘;
//$(fb_script).appendTo(fmain);
$(fdiv).appendTo(fmain);
FB.XFBML.parse();

xp = “#star”+x;ci=0;
var pl = $(xp + ” > div.field-name-body > div.field-items > div.field-item”).children(‘p’).length;
if(pl>3)
$(xp + ” > div.field-name-body > div.field-items > div.field-item”).children(‘p’).each(function(i, n)
ci= parseInt(i) + 1; t=this;
);

var $dfpAdrhs = $(‘.main-rhs’ + x).children().find(‘.adATF’).empty().attr(“id”, “ad-300-” + x);
var $dfpAdrhs2 = $(‘.main-rhs’ + x).children().find(‘.adBTF’).empty().attr(“id”, “ad-300-2-” + x);
var instagram_script=document.createElement(‘script’);
instagram_script.defer=”defer”;
instagram_script.async=”async”;
instagram_script.src=”https://platform.instagram.com/en_US/embeds.js”;

/*var outbrain_script=document.createElement(‘script’);
outbrain_script.type=”text/javascript”;
outbrain_script.async=”async”;
outbrain_script.src=”https://widgets.outbrain.com/outbrain.js”;
var Omain = $(“#outbrain-“+ x);
//alert(Omain + “–” + $(Omain).length);

$(Omain).after(outbrain_script);
var rhs = $(‘.main-article > .row > div.article-right-part > div.rhs394331:first’).clone();
$(rhs).find(‘.ad-one’).attr(“id”, “ad-300-” + x).empty();
$(rhs).find(‘.ad-two’).attr(“id”, “ad-300-2-” + x).empty();
//$(‘.main-article > .row > div.article-right-part > div.rhs394331:first’).clone().appendTo(‘.main-article > .row > div.main-rhs’ + x);
$(rhs).appendTo(‘.main-article > .row > div.main-rhs’ + x); */

setTimeout(function()

var twit = $(“div.field-name-body”).find(‘blockquote[class^=”twitter”]’).length;
var insta = $(“div.field-name-body”).find(‘blockquote[class^=”instagram”]’).length;
if(twit==0)twit = ($(“div.field-name-body”).find(‘twitterwidget[class^=”twitter”]’).length);
if(twit>0)
if (typeof (twttr) != ‘undefined’)
twttr.widgets.load();

else
$.getScript(‘https://platform.twitter.com/widgets.js’);

//$(twit).addClass(‘tfmargin’);

if(insta>0)
$(‘.content > .left-block:last’).after(instagram_script);
//$(insta).addClass(‘tfmargin’);
window.instgrm.Embeds.process();

, 1500);

});
/*$(“#loadmore”).click(function()
x=$(next_selector).attr(‘id’);
var url = $(next_selector).attr(‘href’);
disqus_identifier=”ZNH” + x;
disqus_url = url;
handle.autopager(‘load’);
history.pushState(” ,”, url);
setTimeout(function()
//twttr.widgets.load();
//loadDisqus(jQuery(this), disqus_identifier, disqus_url);
, 6000);
);*/

/*$(“button[id^=’mf’]”).live(“click”, disqusToggle);
function disqusToggle()
console.log(“Main id: ” + $(this).attr(‘id’));
*/

var title, imageUrl, description, author, shortName, identifier, timestamp, summary, newsID, nextnews;
var previousScroll = 0;
//console.log(“prevLoc” + prevLoc);
$(window).scroll(function()
var last = $(auto_selector).filter(‘:last’);
var lastHeight = last.offset().top ;
//st = $(layout).scrollTop();
//console.log(“st:” + st);
var currentScroll = $(this).scrollTop();
if (currentScroll > previousScroll)
_up = false;
else
_up = true;

previousScroll = currentScroll;
//console.log(“_up” + _up);

var cutoff = $(window).scrollTop() + 64;
//console.log(cutoff + “**”);
$(‘div[id^=”row”]’).each(function()
//console.log(“article” + $(this).children().find(‘.left-block’).attr(“id”) + $(this).children().find(‘.left-block’).attr(‘data-url’));
if($(this).offset().top + $(this).height() > cutoff)
//console.log(“$$” + $(this).children().find(‘.left-block’).attr(‘data-url’));
if(prevLoc != $(this).children().find(‘.left-block’).attr(‘data-url’))
prevLoc = $(this).children().find(‘.left-block’).attr(‘data-url’);
$(‘html head’).find(‘title’).text($(this).children().find(‘.left-block’).attr(‘data-title’));
pSUPERFLY.virtualPage(prevLoc,$(this).children().find(‘.left-block’).attr(‘data-title’));

//console.log(prevLoc);
//history.pushState(” ,”, prevLoc);
loadshare(prevLoc);

return false; // stops the iteration after the first one on screen

);
if(lastHeight + last.height() < $(document).scrollTop() + $(window).height())
//console.log("**get");
url = $(next_selector).attr('href');
x=$(next_selector).attr('id');
////console.log("x:" + x);
//handle.autopager('load');

/*setTimeout(function()
//twttr.widgets.load();
//loadDisqus(jQuery(this), disqus_identifier, disqus_url);
, 6000);*/

//lastoff = last.offset();
//console.log("**" + lastoff + "**");
);
//$( ".content-area" ).click(function(event)
// console.log(event.target.nodeName);
//);

/*$( ".comment-button" ).live("click", disqusToggle);
function disqusToggle()
var id = $(this).attr("id");
$("#disqus_thread1" + id).toggle();
;*/
$(".main-rhs394331").theiaStickySidebar();
var prev_content_height = $(content_selector).height();
//$(function()
var layout = $(content_selector);
var st = 0;
///);

}
}
});

/*}
};*/
})(jQuery);



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